Small Companies: छोटी कंपनियों के लिए बिजनेस करना हुआ आसान, देखें क्या हैं नए नियम


Small Company New Definition Applicability : देश की छोटी कंपनियों (Small Companies) को लेकर कई तरह की योजना मोदी सरकार (Modi Government) चला रही है. जिसके तहत इन कंपनियों को होने वाली परेशानियों का निदान जल्द किया जाता है. सरकार की ओर से इन कंपनियों को कई तरह की रियायतें भी दी जाती है. आपको बता दे कि केंद्र सरकार ने छोटी कंपनियों की पूंजी और टर्नओवर (Capital and Turnover) से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया जाता है.

मंत्रालय से अध्यादेश जारी 
केन्द्रीय कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) ने एक अध्यादेश जारी कर दिया है, जिसमें छोटी कंपनियों को नए सिरे से परिभाषित (Redefined) किया है. साथ ही छोटी कंपनियों के पेडअप कैपिटल (Paid-Up Capital) के दायरे को अधिकतम 2 करोड़ रुपये से बढ़ाकर अब 4 करोड़ रुपये कर दिया गया है. नए नियमों के तहत मंत्रालय ने छोटी कंपनियों के टर्नओवर की सीमा, जो पहले अधिकतम 20 करोड़ रुपये थी उसे बढ़ाकर अब 40 करोड़ रुपये कर दिया है.

ये हुआ बदलाव 
मालूम हो कि केंद्र सरकार देश में इज ऑफ डूईंग बिजनेस को बढ़ावा देने के लिए यह कदम उठाया है. कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय देश में कंपनी लॉ लागू किया है. मंत्रालय ने व्यापार सुगमता और जीवन सुगमता के लिए निकट अतीत में कई उपाय किए हैं. इनमें कंपनी अधिनियम, 2013 और सीमित देयता भागीदारी अधिनियम, 2008 के विभिन्न प्रावधानों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है.

क्या है कंपनी अधिनियम
स्टार्ट-अप इंडिया में फास्ट-ट्रैक विलय को बढ़ाना, एकल व्यक्ति कंपनियों (ओपीसी) के निगमीकरण को प्रोत्साहन देने का फैसला किया है. कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत “छोटी कंपनियों” की परिभाषा चुकता पूंजी की उनकी सीमा को बढ़ाकर संशोधित की थी. इस संदर्भ में चुकता पूंजी की सीमा को “50 लाख रुपये से अधिक नहीं” को “2 करोड़ रुपये से अधिक नहीं” किया गया था.

क्या है नई परिभाषा 
कारोबार को “2 करोड़ रुपये से अधिक नहीं” से बदलकर “20 करोड़ रुपये से अधिक नहीं” कर दिया था. इस परिभाषा को अब और संशोधित किया है, जिसके अनुसार चुकता पूंजी की सीमा को “2 करोड़ रुपये से अधिक नहीं” से “4 करोड़ रुपये से अधिक नहीं” कर दिया तथा कारोबार को “20 करोड़ रुपये से अधिक नहीं” से बदलकर “40 करोड़ रुपये से अधिक नहीं” कर दिया है.

अब मिलेगी ये सुविधाएं

  • अब वित्तीय लेखा-जोखा के अंग के रूप में नकदी प्रवाह का लेखा-जोखा तैयार करने की जरूरत नहीं.
  • छोटी कंपनी के लेखा-परीक्षक के लिये जरूरी नहीं रहा है कि वह आंतरिक वित्तीय नियंत्रणों के औचित्य पर रिपोर्ट तथा अपनी रिपोर्ट में वित्तीय नियंत्रण की संचालन क्षमता प्रस्तुत करे.
  • कंपनी के वार्षिक रिटर्न पर कंपनी सेक्रटेरी हस्ताक्षर कर सकता है या कंपनी सेक्रेटरी के न होने पर कंपनी का निदेशक हस्ताक्षर कर सकता है.
  • संक्षिप्त वार्षिक रिटर्न तैयार और फाइल करने का लाभ.
  • लेखा परीक्षक के अनिवार्य रोटेशन की जरूरत नहीं.
  • बोर्ड की बैठक वर्ष में केवल 2 बार की जा सकती है.
  • छोटी कंपनियों के लिये कम जुर्माना.

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