रिज़र्व बैंक ने रेपो दर 0.4 प्रतिशत बढ़ाई, आवास और वाहन से जुड़ी ईएमआई बढ़ेगी



इस वृद्धि के साथ रेपो दर रिकॉर्ड निचले स्तर चार प्रतिशत से बढ़कर 4.40 प्रतिशत हो गई है. अगस्त, 2018 के बाद यह पहला मौका है, जब नीतिगत दर बढ़ाई गई है. साथ ही यह पहला मामला है जब आरबीआई के गवर्नर की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने प्रमुख ब्याज दर बढ़ाने को लेकर बिना तय कार्यक्रम के बैठक की.

रेपो दर वह दर है, जिस पर किसी देश का केंद्रीय बैंक (भारत के मामले में भारतीय रिजर्व बैंक) धन की किसी भी कमी की स्थिति में वाणिज्यिक बैंकों को पैसा उधार देता है.

मौद्रिक नीति समिति की बैठक में नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) को 0.50 प्रतिशत बढ़ाकर 4.5 प्रतिशत करने का भी निर्णय किया गया. इससे बैंकों को अतिरिक्त राशि केंद्रीय बैंक के पास रखनी पड़ेगी जिससे उनके पास ग्राहकों को कर्ज देने के लिए कम पैसा उपलब्ध होगा.

रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ईंधन और खाद्य वस्तुओं के दाम में तेजी तथा महामारी से जुड़ी आपूर्ति संबंधी बाधाओं के कारण मुद्रास्फीति (महंगाई दर) लगातार तीसरे महीने आरबीआई के 6 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है.

आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने नीतिगत दर में वृद्धि के बारे में ‘ऑनलाइन’ जानकारी देते हुए कहा कि सीआरआर बढ़ने से बैंकों में 87,000 करोड़ रुपये की नकदी घटेगी.

हालांकि, उन्होंने रिवर्स रेपो दर का जिक्र नहीं किया. इससे यह 3.35 प्रतिशत पर बरकरार है. स्थायी जमा सुविधा दर अब 4.15 प्रतिशत, जबकि सीमांत स्थायी सुविधा दर और बैंक दर 4.65 प्रतिशत होगी.

हालांकि, मौद्रिक नीति समिति ने उदार रुख को भी बरकरार रखा है.

दास ने कहा कि मुद्रास्फीति खासकर खाद्य वस्तुओं की महंगाई को लेकर दबाव बना हुआ है. ऊंची कीमतें लंबे समय तक बने रहने का जोखिम है.

उन्होंने कहा, ‘भारतीय अर्थव्यवस्था की सतत और समावेशी वृद्धि के लिए मुद्रास्फीति को काबू में करना जरूरी है.’ उन्होंने कहा कि ब्याज दरों में बढ़ोतरी का मकसद मध्यम अवधि के आर्थिक विकास की संभावनाओं को मजबूत करना है.

मुद्रास्फीति के बारे में बोलते हुए आरबीआई गवर्नर ने कहा कि भू-राजनीतिक तनाव प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति को उच्च करने के लिए मजबूर कर रहे हैं. कच्चे तेल की कीमत अस्थिर है और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है. दास ने कहा कि यूरोप के संघर्ष और निर्यातक द्वारा प्रतिबंध के कारण खाद्य तेल की कमी है.

सकल मुद्रास्फीति मार्च में बढ़कर 17 महीने के उच्चस्तर 6.95 प्रतिशत पर पहुंच गई और अप्रैल में भी इसके लक्ष्य से ऊपर बने रहने की आशंका है.

आरबीआई को दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ महंगाई दर को चार प्रतिशत के दायरे में रखने की जिम्मेदारी मिली हुई है.

मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक आठ जून को प्रस्तावित है और विश्लेषक रेपो दर में 0.25 प्रतिशत और वृद्धि की संभावना जता रहे हैं.

दास ने कहा, ‘मौद्रिक नीति समिति ने यह फैसला किया कि मुद्रास्फीति परिदृश्य को देखते हुए उपयुक्त और समय पर तथा सूझ-बूझ के साथ कदम जरूरी है. ताकि दूसरे चरण में अर्थव्यवस्था पर आपूर्ति संबंधी झटकों के असर को काबू में रखा जाए और मुद्रास्फीति को लेकर दीर्घकालीन लक्ष्य को हासिल किया जाए.’

हालांकि, उन्होंने कहा कि मौद्रिक रुख उदार बना हुआ है और कदम सोच-विचार कर उठाए जाएंगे.

आरबीआई के अचानक से उठाए गए कदम ने बाजार को अचंभित किया और बीएसई सेंसेक्स 1,307 अंक लुढ़क गया. वहीं 10 साल के बांड पर प्रतिफल 7.38 प्रतिशत पर पहुंच गया.

डेलॉयट इंडिया की अर्थशास्त्री रूमकी मजूमदार ने कहा कि नीतिगत दर में वृद्धि की जून में संभावना थी.

उन्होंने कहा, ‘आरबीआई के नीतिगत दर बढ़ाने को लेकर एक महीने पहले ही अचानक से उठाया गया कदम बताता है कि वह देखो और इंतजार करो पर काम नहीं करना चाहता. बल्कि मुद्रास्फीति के आर्थिक पुनरुद्धार को पटरी से उतारने से पहले उसे काबू में लाने को तेजी से कदम उठाने को इच्छुक है.’

मजूमदार ने कहा, ‘हालांकि इससे कर्ज महंगा होगा. जिससे कंपनियां खासकर एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम) प्रभावित होंगे. साथ कर्ज वृद्धि पर भी असर होगा, जो 2019 से नीचे है. आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित होंगी.’

इससे पहले, केंद्रीय बैंक ने बिना तय कार्यक्रम के 22 मई, 2020 को रेपो दर में संशोधन किया था. इसके तहत मांग बढ़ाने के इरादे से रेपो दर को घटाकर अब तक के सबसे निचले स्तर चार प्रतिशत पर लाया गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)





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