मेघालय राज्य की खूबसूरती देखेंगे तो बस देखते ही रह जायेंगे


मेघालय की अन्य दो पहाड़ियां हैं गारो और जयन्तिया। गारो पहाड़ियों को जाना जाता है वनस्पतिक और वन्य जीवन की विविधता के लिए। यहां राष्ट्रीय वन्य जीवन उद्यान तथा नाफक झील भी देखें। यहां सिजु गुफाओं में चूने पत्थर की बनी आकृतियों को देखा जा सकता है।

1972 में असम से अलग होकर भारत के इक्कीसवें राज्य के रूप में नक्शे पर उभरा, अद्भुत नैसर्गिक सुषमा का आलय−मेघालय यानि बादलों का घर। आकाश में बादलों के झुंड, धरती पर चंचल झरने, शांत झीलें और उनमें अपना प्रतिबिम्ब निहारती हरियाली, इन सबके बीच आपकी उपस्थिति आपको अवसर देगी कि आप अपने भाग्य पर गर्व कर सकें। यह राज्य गारो, खासी तथा जयन्तिया जैसी प्राचीन पहाड़ी जनजातियों का मूल निवास स्थान है। इन्हीं लोगों को भारत का प्राचीनतम निवासी माना जाता है।

ब्रिटिश राज के दौरान स्कॉटलैंड ऑफ ईस्ट कहा जाने वाला शहर शिलांग मेघालय की राजधानी है। खासी पहाड़ियों में, समुद्रतल से लगभग 1500 मी. की ऊंचाई पर बसे इस शहर का नाम एक जनजातीय देवता शुलांग के नाम पर पड़ा है। प्यार से मिनी लंदन पुकारे जाने वाले शहर के चप्पे−चप्पे पर अंग्रेजी प्रभाव के निशान खोजे जा सकते हैं।

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शिलांग जैसे छोटे शहर में दर्शनीय स्थानों की सूची छोटी नहीं है। शहर के बीचों−बीच स्थित है वार्डलेक। 1893−94 में बनी यह झील पर्यटकों का ही नहीं स्थानीय लोगों का भी प्रिय स्थान है। खूबसूरत बगीचों की हरियाली और झील के बीच में बना लकड़ी का पुल इसकी विशेषता है। इस लकड़ी के पुल पर से आप झील की मछलियों को देख सकते हैं और चाहें तो उन्हें आटे की गोलियां भी खिलाएं। निःसंदेह बच्चों को यह काम बहुत अच्छा लगेगा। झील के पानी में उतरना चाहें तो नौकाविहार कर सकते हैं। खाने−पीने का अच्छा प्रबंध होना इस स्थान को सुविधाजनक भी बना देता है।

यदि आपकी दिलचस्पी पेड़−पोधों में है तो झील के पास स्थित बाटेनिकल गार्डन अवश्य जाएं। वनस्पति विज्ञान के छात्रों के लिए यह स्थान बहुत उपयोग साबित होगा। इसके पास ही स्थित डेलिमार वांगखा का तितलियों का सग्रंह भी देखें। दुनिया भर का तितलियों से संबधित जिज्ञासा यहां शांत की जा सकती है। 

किताबों में रूचि हो और ज्ञान में वृद्धि चाहें तो विशेष रूप से प्राचीन जीवन शैली से जुड़ी जानकारियों चाहें तो स्टेट सैन्ट्रल लाइब्रेरी जाना उचित होगा। साथ ही आपको अपनी ओर खीचेंगे डांन बास्को तथा आंल सैन्ट चर्च। डांन बास्को चर्च की विशाल इमारत और अनूठा प्रार्थना कक्ष ही इसकी खासियत हैं।

1889 में बना भारत का तीसरा सबसे पुराना गोल्फ कोर्स भी शिलांग में ही है। चीड़ और देवदार के ऊंचे वृक्षों से घिरे इस स्थान की मखमली धास का मजा लेने के लिए आपका गोल्फ में रूचि रखना जरूरी नहीं। अक्सर सूर्यादय और सूर्यास्त के सुन्दर दृश्यों को नजरों में भरनेा के लिए भी पर्यटक यहां आते हैं।

खासी जनजाति के मातृ−सत्तात्मक समाज की छाप देंखें यहां के बड़ा बाजार में। इस बाजार को पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। यहां खरीददारी करें हस्तशिल्प की और बांस के बने सामान की। यहां के जीवन को और करीब से जानना हो तो पास ही स्थित पुलिस बाजार भी जाना चाहिए।

शिलांग से लगभग 2 किलोमीटर दूर है एलिफेन्टा फॉल (झरना)। हाथी के आकार के इस प्राकृतिक झरने की सौन्दर्य वृद्धि की है लकड़ी के छोटे−छोटे पुलों ने। इस झरने के नाम के कारण के बारे में लोगों में मतैक्य नहीं है। कुछ लोगों के अनुसार इस जगह के नाम का कारण, कभी यहां हाथियों का पानी पीने आना था जबकि दूसरों के अनुसार, इसका हाथी जैसा आकार। कुछ लोग इसके नामकरण की कथा सुनाते हैं कि किसी अंग्रेज अधिकारी का हाथी रास्ता भटक कर यहां पहुंच गया और यहीं उसकी मृत्यु हो गई तो यह नाम पड़ा। इसी खींच−तान के बीच एक अन्य कथा यह भी है कि यहां हाथी पानी पीने आते थे। किसी कारण वश यहां एक हाथी की मृत्यू के पश्चात हाथियों ने यहां आना बंद कर दिया। स्थानीय लोग इस मृत हाथी को देखने यहां पहुंचे, यही घटना इस स्थान के नामकरण का कारण है। इसी से यह स्थान लोकप्रिय भी हुआ।

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शिलांग और उसके आसपास के क्षेत्र में कई और झरने भी है जैसे मारग्रेट फांल, बिशप फांल, स्वीट फांल आदि।

समुद्र की सतह से लगभग 1960 मी. ऊंचाई पर, शिलांग से करीब 10 किमी. दूर है शिलांग पीक। ऐसा विश्वास है कि जनजातीय देवता शुलांग यहीं निवास करते हैं। यहां के खुले वातावरण और ऊंचाई को ध्यान में रखकर कुछ गर्म कपड़े ले जाना गलत नहीं होगा।

उमियाम झील, गुवाहाटी से शिलांग के बीच का सबसे सुन्दर पड़ाव है। यह स्थान शिलांग से लगभग 17 किमी. दूर है। बड़ा पानी के नाम से प्रसिद्ध यह झील एक बांध के निर्माण के फलस्वरूप अस्तित्व में आई थी। इस झील के पास बने नेहरू उद्यान को भी देखें। यह झील पानी के खेलों के लिए प्रसिद्ध है।

1897 के भयानक भूकंप से धरती पर तराशे गए दर्रे के लिए विख्यात है माफलोग। यहां प्रकृति की सुन्दरता ने भूकंप की भयावहता को ढक दिया है। शिलांग से लगभग 64 किमी दूर है जरकेम। यहां गधंक के झरने हैं। ऐसा विश्वास है कि झरनों के पानी से अनेक बीमारियों का निदान संभव है।

मेघालय की अन्य दो पहाड़ियां हैं गारो और जयन्तिया। गारो पहाड़ियों को जाना जाता है वनस्पतिक और वन्य जीवन की विविधता के लिए। यहां राष्ट्रीय वन्य जीवन उद्यान तथा नाफक झील भी देखें। यहां सिजु गुफाओं में चूने पत्थर की बनी आकृतियों को देखा जा सकता है।

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हिलौरे लेती मिन्तदू नदी से घिरी जयन्तिया पहाड़ी शिलांग से लगभग 64 किमी. दूर हैं। जोवाई, जयन्तिया जनजाति का मुख्यालय भी यहीं है। यहां सिन्दाल गांव में अनेक गुफाओं की सैर की जा सकती है की। जयन्तियां राजा तथा विदेशी आक्रमणकारियों के बीच युद्ध के दौरान कभी इनका प्रयोग छिपने के स्थान के रूप में होता था।

लगभग 1300 मी की ऊंचाई पर, शिलांग से 56 किमी. दूर स्थित है चेरापूंजी। एक लंबे समय, इस क्षेत्र को विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा है। यहां रोमांच लें विश्व के चौथे सबसे ऊंचे झरने नहिकालीफाई को देखने का। इसी प्रकार मांसमाई और लम लाबाध की रहस्यमयी गुफाओं की सैर भी यादगार साबित होगी।

वर्तमान में सर्वाधिक वर्षा तथा लगभग निरन्तर बने रहने वाले इन्द्रधनुषों की भूमि मांसेनरम, चेरापूंजी के पास ही है। वर्षा ऋतु में लगभग अगम्य बन जाने वाला यह स्थान अपने चूने पत्थर के बने विशाल शिवलिंग के लिए खासा लोकप्रिय है। यहां भयावह ऊंचाई लिए बेहत खूबसूरत झरने भी आपको भाएंगे।

जून−जुलाई का समय मेघालय में उत्सवों का समय है। 4 दिनों तक चलने वाला किसानों का उत्सव है वेटडीनक्लामू। इसमें पारम्परिक नृत्य संगीत के साथ−साथ बैलों की लड़ाई का मजा लें। स्थानीय देवता यू शिलांग और पूर्वजों के सम्मान में आयोजित होने वाले नौंग क्रेम नृत्य उत्सव में शामिल होना नहीं भूलें।

अधिक वर्षा वाले दिनों को छोड़ हर मौसम में यहां आया जा सकता है। यहां का जाड़ा कुछ अधिक ठंडा और गर्मियां सुहावनी होती हैं। निश्चय ही यह छोटा−सा राज्य गर्मी से बड़ी राहत दिला सकता है।

– प्रीटी



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