मां लक्ष्मी का प्रतीक हैं ये शंख: दूधाधरी मठ के कमरे में रखे जाते हैं, सालभर में एक बार होते हैं दक्षिणावर्ती शंख के दर्शन


रायपुर3 घंटे पहले

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रायपुर के दूधाधरी मठ में एक ऐसे शंख हैं, जिनके दर्शन साल में सिर्फ एक दिन होते हैं। मठ के एक कमरे में सुरक्षित रखे इन शंख को दिवाली की रात निकाला जाता है। इस कमरे में सालभर किसी को जाने की इजाजत नहीं होती। ये शंख इस वजह से खास हैं, क्योंकि ये दक्षिणावर्ती शंख हैं। दक्षिणावर्ती शंख का मतलब ऐसा शंख जिसे हाथ से पकड़ने की जगह दाईं तरफ होती है। आमतौर पर मिलने वाले शंख को बाईं तरफ से पकड़ा जा सकता है।

महंत राम सुंदर दास शंख के साथ।

महंत राम सुंदर दास शंख के साथ।

लगभग 500 साल पुराने इन शंखों को हर साल दिवाली की रात पूजा जाता है। इसको शास्त्रों में लक्ष्मी माता का प्रतीक माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस शंख के दर्शन से सुख समृद्धि मिलती है। मठ में मौजूद ऐसे 2 शंखों को आरती के बाद आम लोगों के दर्शन के लिए रखा जाता है। मंदिर स्थापना से ही यह परंपरा चली आ रही है। मठ प्रमुख महंत डॉ. रामसुंदर दास ने बताया कि साल में सिर्फ एक बार दिवाली की रात को ही इसे आम लोगों के दर्शन के लिए रखा जाता है।

मठ में दिवाली का नजारा।

मठ में दिवाली का नजारा।

मठ के पहले महंत बलभद्र दास ये शंख लेकर मठ में आए थे। अथर्ववेद के 10वें सूक्त में कहा गया है कि शंख अंतरिक्ष, वायु ज्योतिर्मंडल व सुवर्ण से संयुक्त है। इसकी ध्वनि शत्रुओं को निर्बल करने वाली होती है। शास्त्रों के अनुसार शंख तीन प्रकार के बताए गए हैं। वामावर्ती, दक्षिणावर्ती और मध्यवर्ती। दक्षिणावर्ती शंख बेहद दुर्लभ माने जाते हैं। इस वजह से शास्त्रों के मुताबिक इसकी विशेष रूप से पूजा की जाती है।

दीयों से बनी ओम की आकृति।

दीयों से बनी ओम की आकृति।

जानिए दूधाधारी नाम के पीछे दिलचस्प कहानी
महामाईपारा स्थित दूधाधारी मठ का इतिहास लगभग 500 साल पुराना है। यह मठ शहर के ऐतिहासिक स्मारकों में से एक है। 1554 में राजा रघुराव भोसले ने महंत बलभद्र दासजी के लिए मठ का निर्माण कराया था। यहां कई देवी-देवताओं की मूर्ति और मंदिर हैं। यहां बालाजी मंदिर, वीर हनुमान मंदिर और राम पंचायतन मंदिर प्रमुख हैं। इन मंदिरों में मराठाकालीन पेंटिंग आज भी देखी जा सकती है।

राम भक्त हनुमान के मंदिर पर दीया जलाते महंत।

राम भक्त हनुमान के मंदिर पर दीया जलाते महंत।

दूधाधारी मठ के महंत रामसुंदर दास ने बताया कि मठ के संस्थापक महंत बलभद्र दास बहुत बड़े हनुमान भक्त थे। श्रद्धाभाव से उनकी पूजा-अर्चना करते थे। वह अपनी गाय सुरही के दूध से हनुमानजी की प्रतिमा को नहलाते थे, फिर उसी दूध का सेवन करते थे। कुछ समय बाद उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया और सिर्फ दूध को ही आहार के रूप में लेने लगे। इसी वजह से मठ का नाम दूधाधारी मठ रख दिया गया।

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