मणिपुर: राज्य के बारे में किताब प्रकाशित करने के लिए लेनी होगी सरकारी अनुमति


मणिपुर की भाजपा सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में कहा है कि राज्य के इतिहास, संस्कृति, परंपरा और भूगोल पर प्रकाशित कुछ पुस्तकों की सामग्री तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करती है. इसलिए, इन किताबों को ‘सही जानकारी’ के साथ प्रकाशित करने पर निगरानी रखने के लिए एक 15 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है.

(प्रतीकात्मक फोटो: अनस्पलेश)

कोलकाता: मणिपुर सरकार ने राज्य के इतिहास, संस्कृति, परंपरा और भूगोल पर सभी किताबों के प्रकाशन से पहले राज्य द्वारा नियुक्त समिति से पूर्व-अनुमोदन लेना अनिवार्य कर दिया है.

यह आदेश राज्य के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के सचिवालय द्वारा 15 सितंबर को अधिसूचित किया गया था.

आदेश में कहा गया है कि सरकार के संज्ञान में यह आया है कि ‘राज्य के इतिहास, संस्कृति, परंपरा और भूगोल पर प्रकाशित कुछ पुस्तकों में ऐसी सामग्री है जो या तो तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करती है या विभिन्न समुदायों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बिगाड़ सकती है.’

इसमें आगे कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने इन किताबों को ‘सही जानकारी’ के साथ प्रकाशित करने पर निगरानी रखने के लिए एक 15 सदस्यीय समिति का गठन किया है.

आदेश में कहा गया है, ‘राज्य के इतिहास, संस्कृति, परंपरा और भूगोल पर पुस्तकों के प्रकाशन के इच्छुक कोई भी व्यक्ति/समूह किताब की एक हस्तलिखित प्रति के साथ मणिपुर के विश्वविद्यालय व उच्च शिक्षा निदेशक के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं, जो मंजूरी के लिए यह मामला समिति के समक्ष रखेंगे. जब भी जरूरत होगी समिति अपनी बैठक बुलाएगी.’

राज्य सरकार के आदेश में कहा गया है, इस प्रक्रिया का पालन किए बगैर प्रकाशित कोई भी पुस्तक ‘संबंधित कानून के तहत दंडित किए जाने के लिए उत्तरदायी होगी.’

समिति की अध्यक्षता राज्य के शिक्षा मंत्री टीएच बसंत सिंह करेंगे और इसमें विश्वविद्यालय के कुलपति, कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षक शामिल होंगे तथा विश्वविद्यालय एवं उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक सदस्य-सचिव होंगे.

एन. बीरेन सिंह सरकार का यह फैसला उस विवाद के मद्देनजर आया है, जिसमें एक पीएचडी थीसिस में दावा किया गया था कि भारत में विलय के समय मणिपुर की रियासत घाटी के केवल 700 वर्ग मील क्षेत्र में बनी थी. इसका आशय था कि मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्र जिनमें नगा, कुकी और अन्य आदिवासी रहते हैं, कभी मणिपुर का हिस्सा नहीं थे.

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) से सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर सुशील कुमार शर्मा ने उक्त थीसिस लिखी थी, जिसे एक किताब के रूप में भी प्रकाशित किया गया था. इस पर मई से विवाद जारी है.

कई स्थानीय संगठनों ने किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है और किताब के लेखक से माफी की मांग की है. संगठनों का दावा है कि भारत में विलय के वक्त मणिपुर 8,620 वर्ग मील में फैला हुआ था.

हालांकि, मणिपुर सिविल सोसाइटी के सदस्यों और विशेषज्ञों ने सरकार के फैसले की आलोचना की है.

इंफाल के मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील बबलू लोइतोंग्बेम ने द वायर  को बताया, ‘यह अकादमिक स्वतंत्रता का अपमान है. इसे अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए.’

एक अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ता देबब्रत रॉय ने फेसबुक पर लिखा, ‘यह मौलिक स्वतंत्रता का हनन है. खुली सेंसरशिप? स्वतंत्र भारत में किसी भी राज्य प्राधिकरण ने ऐसा कोई कदम उठाने का प्रयास नहीं किया है. सभी को इस कदम का विरोध करना चाहिए.’

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में सहायक प्रोफेसर और लेखक थोंगखोलाल हाओकिप ने कहा कि यह कदम अकादमिक स्वतंत्रता व आलोचनात्मक सोच को बर्बाद कर देगा और अनुसंधान कार्य पर सरकारी नियंत्रण लागू करेगा. उनका कहना है कि इस तरह के अभ्यास से अकादमिक बहस का दायरा खत्म हो जाएगा.

उन्होंने पूछा, ‘कैसे और किस योग्यता व आधार पर समिति के सदस्य भारत के अन्य हिस्सों और विदेशों में काम कर रहे अत्यधिक प्रशंसित विद्वानों के कार्यों का मूल्यांकन करेंगे?’

इंफाल के एक प्रकाशक ने गोपनीयता की शर्त पर कहा कि कई प्रकाशन संगठन आपस में मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं और कुछ दिनों में किसी निर्णय के साथ सामने आएंगे.

उन्होंने कहा, ‘हम चर्चा कर रहे हैं कि क्या हमें एक बयान जारी कर सरकार से अधिसूचना वापस लेने के लिए कहना चाहिए या अदालत जाना चाहिए या इस तरह का उल्लंघन करने पर किसी प्रकाशक के खिलाफ सरकारी कार्रवाई की प्रतीक्षा करना चाहिए.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)





Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *