भारत में दो तरह के मुख्यमंत्री होते हैं-एक रीजनल स्टार और दूसरे कांग्रेस-भाजपा के रहमोकरम वाले


चित्रण: रमनदीप कौर/ दिप्रिंट


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भारत अब दो तरह के मुख्यमंत्रियों का देश बन गया है. एक वे हैं जो क्षेत्रीय दलों के उभरते सितारे हैं और हर चुनाव के साथ राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं. दूसरी तरह के मुख्यमंत्री वे हैं जो दो बड़े राष्ट्रीय दलों के अस्थायी प्रादेशिक चेहरे हैं और जिनकी हुकूमत अपने पार्टी आलाकमान के फैसले पर ताश के महल की तरह ढह जाटी है.

निरंतर उत्कर्ष की ओर बढ़ते अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, और जगन मोहन रेड्डी सरीखे मुख्यमंत्रियों के साथ-साथ कांग्रेस और भाजपा के कमजोर होते मुख्यमंत्री भी हैं जिन्हें आलाकमान जरूरत पड़ने पर हटा कर ज्यादा ‘फायदेमंद’ चेहरे को सामने ले आता है.

उत्तराखंड के त्रिवेंद्र सिंह रावत और कर्नाटक के बी.एस. येदियुरप्पा से लेकर गुजरात के विजय रूपाणी और अब पंजाब के अमरिंदर सिंह तक को राजनीतिक मजबूरियों के चलते या मनमर्जी से दरकिनार करने या हटा देने में राष्ट्रीय दलों के शीर्ष नेतृत्व को कोई हिचक नहीं होती, जबकि येदियुरप्पा या अमरिंदर सरीखे नेता दबदबा रखते हैं, और अमरिंदर ने तो मोदी लहर में भी कांग्रेस को चुनाव जितवाया.

इनकी तुलना दूसरी तरह के मुख्यमंत्रियों से कीजिए, जो क्षेत्रीय दलों के कर्ताधर्ता हैं, जैसे पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, दिल्ली के केजरीवाल, आंध्र प्रदेश के जगन रेड्डी, तमिलनाडु के एम.के. स्टालिन. इन सबकी धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय छवि और हैसियत बन रही है, जो मोदी की भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकते हैं और प्रबल चुनौती के रूप में उभर भी रहे हैं.


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आलाकमान के हुक्मनामे

बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा सामने लाना महत्वपूर्ण है, और क्या वोट उस चेहरे के लिए या पार्टी के लिए या मोदी या गांधी परिवार के रूप में पार्टी सुप्रीमो के लिए ही डाले जाते हैं?  इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं, और जवाब प्रायः व्यापक राजनीतिक परिस्थिति अथवा प्रदेश-केंद्रित स्थिति पर निर्भर करते हैं.

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