भविष्य में रोजगार पाने वालों से लेकर खराब रोजगार वालों तक, यही करेंगे भारत के अगले जनांदोलन का नेतृत्व


बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में बेरोज़गारी को लेकर विरोध प्रदर्श करते हुए छात्रों की फाइल फोटो । फोटोः एएनआई


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परिपाटी तो यही मानने की रही है कि भारत में बेरोजगारी को आधार बनाकर कोई सियासी लामबंदी नहीं हो सकती. आप मंहगाई, भ्रष्टाचार जैसे आमफहम मुद्दों को आधार बनाकर जन-आंदोलन छेड़ सकते हैं या फिर जाति-आधारित आरक्षण और कृषि कानून सरीखे तबकाती मुद्दे पर जनान्दोलन चला सकते हैं लेकिन आप ऐसा ही आंदोलन बढ़ती बेरोजगारी को आधार बनाकर खड़ा नहीं कर सकते, भले ही बेरोजगारी का आंकड़ा कितना भी आकाश छूता क्यों न हो. बेरोजगारी के मुद्दे पर जन-आंदोलन न खड़ा कर पाने को लेकर संशयवादियों में प्रचलित ऐसे ही तर्क महेश व्यास ने अपने हाल के एक लेख में उठाये हैं.

लेकिन मैं इन तर्कों से सहमत नहीं.

मेरा मानना है कि भारत में अभी हम जिस किस्म और जिस दर्जे की बेरोजगारी देख रहे हैं वह एक जन-आंदोलन को जन्म दे सकती है. दरअसल, बेरोजगारी के मुद्दे पर देश भर में एक बड़ा आंदोलन जैसे फूट पड़ने को तैयार बैठा है. यह आंदोलन जंगल की आग की तरह फैलेगा. हां, हमें अभी इतना भर नहीं पता कि जंगल की आग को भड़काने वाली चिनगारी कहां और कब सुलगेगी.

संशयवादियों की चूक

बेरोजगारी की समस्या के भीतर जन-आंदोलन बन पाने की कूबत होने को लेकर शंका करनेवालों के प्रति इमानदारी बरतते हुए कहें तो दरअसल यही कहना ठीक होगा कि एक मुद्दे के रुप में बेरोजगारी के महत्व को वे कम करके नहीं आंकते. वस्तुतः महेश व्यास के संस्थान, सेंटर फॉर द मॉनिटॉरिंग ऑफ इंडियन इकॉनॉमी ने बेरोजगारी के सिलसिलेवार बेहतरीन आंकड़े पेश किये हैं. बेरोजगारों की बढ़ती तादाद के बाबत देश को चेताने के मोर्चे पर महेश व्यास अग्रणी रहे हैं. लेकिन, संशयवादियों का मुख्य तर्क है कि बेरोजगारों की तादाद फिलहाल हद दर्जे तक क्यों न बढ़ गई हो फिर भी उसने देश की आबादी के बड़े छोटे से हिस्से को प्रभावित किया है. दूसरी बात यह कि जो बेरोजगारी की मुश्किल को झेल रहे हैं वे मानकर चलते हैं कि यह उनकी निजी नाकामी का नतीजा है, इसमें व्यवस्था का कोई दोष नहीं जो इसके समाधान के लिए कोई राजनीतिक तरीका आजमाया जाये. इस सिलसिले की तीसरी और आखिरी बात यह कि बेरोजगारी की दशा में पड़े लोग अपने को बड़ा अशक्त महसूस करते हैं और उनमें बिखराव भी बहुत ज्यादा होता है सो वे किसी धरना-प्रदर्शन के लिए एकजुट नहीं हो सकते. इसमें कोई शक नहीं कि ये प्रचलित तर्क दमदार हैं और उनमें बड़ी बुद्धिमत्ता की बात कही गई है.

लेकिन हाल के वक्त में भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोनाकाल को झेलती हुई जिन राहों से गुजरी है, उसका तकाजा है कि हम बेरोजगारी को आंदोलन का मुद्दा न मानने के इन तर्कों पर पुनर्विचार करें. यहां हम बस एक मुख्य मुद्दे यानि बेरोजगारों की तादाद पर विचार करें. सोचें कि बेरोजगारी के मसले पर राजनीतिक लामबंदी के लिए किस तादाद में लोग मौजूद हैं.

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