बीते तीन सालों में अकाली दल समेत तीन प्रमुख सहयोगियों ने छोड़ा भाजपा का साथ


2019 में लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र की सत्ता में भाजपा के आने के 18 महीनों के भीतर उसके दो पुराने सहयोगियों- शिवसेना और अकाली दल ने उससे नाता तोड़ लिया था. अब जद (यू) ऐसा करने वाला उसका तीसरा प्रमुख राजनीतिक सहयोगी है.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: वर्ष 2019 के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से संबंध तोड़ने वाला जनता दल (यूनाइटेड) उसका तीसरा प्रमुख राजनीतिक सहयोगी है.

लगातार दूसरी बार 2019 में लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र की सत्ता में भाजपा के आने के 18 महीनों के भीतर उसके दो पुराने सहयोगियों, शिवसेना और अकाली दल ने उससे नाता तोड़ लिया था. शिरोमणि अकाली दल ने केंद्र के निरस्त किए गए तीन विवादित कृषि कानूनों के विरोध में एनडीए छोड़ा था.

अगले लोकसभा चुनाव में दो साल से कम समय बचा है और अब जद (यू) ने उससे गठबंधन तोड़ लिया है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से अलग होने वाला जद (यू) सांसदों और विधायकों के मामले में भाजपा के सहयोगियों में सबसे बड़ा दल है.

जद (यू) के जार्ज फर्नांडिस कभी राजग के संयोजक हुआ करते थे, लेकिन नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पार्टी ने 2013 में भी भाजपा से उस वक्त नाता तोड़ लिया था, जब नरेंद्र मोदी को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया था.

वर्ष 2017 में कुमार ने राजद से नाता तोड़ लिया था और महागठबंधन सरकार से अलग होकर भाजपा के साथ सरकार बना ली थी. इसके बाद भाजपा और जद (यू) ने 2020 का विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा और राज्य में सरकार बनाई, लेकिन संबंधों में तनाव के कारण मंगलवार को कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और राजद के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया.

पिछले नौ वर्षों में यह दूसरा मौका है, जब जद (यू) ने भाजपा से रिश्ते तोड़े हैं.

राजग से जद (यू) के बाहर होने के बाद भाजपा के लिए देश का पूर्वी हिस्सा खासा चुनौतीपूर्ण हो गया है. खासकर, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा और बिहार. दक्षिण के राज्य पहले से ही भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण रहे हैं. सिर्फ कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य है, जहां भाजपा की सरकार है. आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में अभी वह एक ताकत के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है.

जद (यू) के अलग होने के बाद लोकसभा सीट की संख्या के हिसाब से अब दो ही ऐसे बड़े राज्य हैं, जहां भाजपा गठबंधन की सरकारें हैं और वे हैं उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र. इन दोनों राज्यों में लोकसभा की 128 सीट हैं.

बिहार, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता में नहीं है और इन राज्यों में लोकसभा की कुल 122 सीट हैं. हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 18 और बिहार में 17 सीट पर जीत हासिल की थी.

उत्तर और पश्चिमी क्षेत्रों में मजबूत प्रर्दशन के दम पर भाजपा 2014 से केंद्र की सत्ता में है और उसकी कोशिश पूर्वी और दक्षिण क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मजबूत करने की है.

‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज’ के प्रोफेसर संजय कुमार ने भाजपा से जद (यू) के अलग होने पर कहा, ‘यह स्पष्ट संकेत है कि सहयोगी दल भाजपा के साथ सहज नहीं हैं और एक-एक कर उससे अलग होते जा रहे हैं.’

उन्होंने कहा, ‘लेकिन साथ ही इससे भाजपा को एक अवसर भी मिलता है कि जिस राज्य की क्षेत्रीय पार्टी ने उसका साथ छोड़ा है, वहां वह अपनी स्थिति मजबूत कर सके.’

अकाली दल के नरेश गुजराल ने कहा कि भाजपा ‘एकला चलो रे’ की रणनीति पर विश्वास करती है और राजग सिर्फ कागजों पर ही रह गया है.

उन्होंने कहा, ‘अभी जो उसमें (राजग) हैं, वह भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए वहां से निकल जाएंगे.’

वर्ष 2014 से 2019 के बीच महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और चंद्रबाबू के नेतृत्व वाली तेलुगु देशम पार्टी राजग से अलग हो गए.

वर्ष 2019 में शिवसेना से भाजपा का गठबंधन टूट गया और उसने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस से गठबंधन कर वहां सरकार बना ली. हालांकि, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का बड़ा धड़ा टूट गया और उसने भाजपा के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बना ली. शिंदे इस गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं.

इनके अलावा झारखंड में सुदेश महतो के नेतृत्व वाला ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन, ओ पी राजभर के नेतृत्व वाला सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, हनुमान बेनीवाल के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, बोडो पीपुल्स पार्टी, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, गोवा फॉरवर्ड पार्टी, एमडीएमके और डीएमडीके भी भाजपा के नेतृत्व वाले राजग से अलग हो गए.

केंद्रीय स्तर पर राजग में फिलहाल कम से कम 17 सहयोगी दल हैं, जबकि कई राजनीतिक संगठनों से उसका कुछ राज्यों में भी गठबंधन है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)





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