फेवरेट फुटबॉल टीम जीती तो कोमा से जागे SD बर्मन: बेटे ने दम मारो दम गाना बनाया तो सिर शर्म से झुका लिया


29 मिनट पहलेलेखक: अरुणिमा शुक्ला

आज संगीतकार एस.डी. बर्मन की 48वीं पुण्यतिथि है। 31 अक्टूबर 1975 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा था। फिल्म इंडस्ट्री और संगीत की दुनिया में उन्हें बर्मन दा के नाम से पुकारा जाता था। संगीत के जादूगर, शानदार आवाज के मालिक और फुटबॉल के डायहार्ट फैन थे बर्मन दा।

फुटबॉल में ईस्ट बंगाल टीम के इतने बड़े फैन थे कि जब वो टीम हार जाती तो उस दिन को खुशी वाला गाना रिकॉर्ड नहीं कर पाते, दर्द भरे गाने रिकॉर्ड करते थे। अपने आखिरी दिनों में जब वो कोमा में थे, तो ईस्ट बंगाल की जीत की खबर सुनकर आंखें खोल दी थी।

अपने संगीत को लेकर इतने संजीदा थे कि जब बेटे आर.डी. बर्मन ने देवानंद के लिए दम मारो दम गाना बनाया तो बर्मन दा का सिर शर्म से झुक गया, वो बेटे से इस तरह के संगीत की उम्मीद नहीं कर रहे थे। एक गाने को लेकर लता मंगेशकर से मनमुटाव हुआ तो सालों तक उनके साथ काम नहीं किया।

आज बर्मन दा की पुण्यतिथि पर पढ़िए उनके कुछ अनसुने दिलचस्प किस्से…

राजघराने में जन्मे थे बर्मन दा

एसडी बर्मन यानी सचिन देव बर्मन का जन्म 1 अक्टूबर 1906 को बंगाल प्रेसिडेंसी के राजघराने में हुआ था। उनकी मां राजकुमारी निर्मला देवी मणिपुर की राजकुमारी थी और उनके पिता एमआरएन देव बर्मन त्रिपुरा के महाराज के बेटे थे। सचिन के 9 भाई-बहन थे और वो अपने 5 भाइयों में सबसे छोटे थे। सचिन को मात्र 2 साल ही मां का प्यार मिल पाया। जब वो 2 साल के थे, तभी उनकी मां का निधन हो गया।

संगीत के लिए छोड़ दिया था राजसी ठाठ-बाट

बर्मन दा के पिता एक राजा के साथ-साथ सितारवादक और गायक भी थे। इसी वजह से बर्मन दा का मन बचपन से ही संगीत में रम चुका था। बर्मन दा को संगीत की बारीकियों की समझ अपने पिता से विरासत में मिली। पिता की मौत के बाद बर्मन दा राजसी ठाठ-बाट छोड़कर पश्चिम बंगाल चले गए थे। वजह थी संगीत के लिए उनका जुनून। यहां पर उन्होंने बंगाल व आसपास के क्षेत्र में लोक संगीत को बहुत करीब से देखा और उससे जुड़ी जानकारियां हासिल की। यही वजह है कि बर्मन दा के गानों में आज भी संगीत का निचोड़ सुनने को मिलता है। यहां पर उन्होंने उस्ताद आफ्ताबुद्दीन खान से बांसुरी वादन की शिक्षा ली थी।

बतौर रेडियो सिंगर की थी करियर की शुरुआत

संगीत के लिए बर्मन दा का प्यार कभी भी कम नहीं हुआ था, लेकिन जीवन यापन के लिए उन्होंने 1932 में रेडियो स्टेशन में काम करना शुरू कर दिया। वो वहां पर बतौर रेडियो सिंगर काम करते थे। यहां पर बर्मन दा बंगाली, त्रिपुरी लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत की गायकी के लिए काफी फेमस हुए। इसी साल उन्होंने अपनी पहली रिकॉर्डिंग भी जारी की और इसके अगले कुछ वर्षों में उन्होंने 131 बंगाली गाने जारी किए थे।

संगीत सिखाने के दौरान स्टूडेंट को दिल दे बैठे थे बर्मन दा

बंगाल में ही बर्मन दा ने एक लड़की को संगीत की शिक्षा देनी शुरू कर दी थी। उस लड़की का नाम था मीरा दासगुप्ता जो कि आगे चलकर बर्मन दा की पत्नी बनीं। संगीत सिखाते हुए ही बर्मन दा को मीरा से प्यार हो गया। दोनों शादी भी करना चाहते थे, लेकिन उनका परिवार इस शादी के लिए तैयार नहीं था। परिवार ने ये दबाव भी बनाया कि दोनों अलग हो जाएं, लेकिन जिद के पक्के बर्मन दा इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे और परिवार के खिलाफ जाकर उन्होंने मीरा से शादी कर ली। शादी के कुछ साल बाद ही मीरा ने आर.डी. बर्मन को जन्म दिया।

अशोक कुमार की जिद ने बर्मन दा को बनाया संगीत की दुनिया का उम्दा कलाकार

1944 में बर्मन दा मुंबई आ गए थे। वजह थी फिल्मिस्तान स्टूडियो के शशधर मुखर्जी। उन्होंने बर्मन दा से कहा कि आपकी गायकी बेहतरीन है और आपको मुंबई आकर इसी में अपना करियर बनाना चाहिए। मुंबई आने के बाद शशधर ने बर्मन दा को अशोक कुमार की दो फिल्मों- शिकारी और आठ दिन में संगीत देने का मौका दिया, लेकिन इन दोनों फिल्मों के गानों से उन्हें कुछ खास पहचान नहीं मिली। निराशा हाथ लगने के बाद उन्होंने मुंबई छोड़ने का फैसला किया, पर अशोक कुमार ने उन्हें ये कह कर रोक लिया कि आप बस मिसाल का संगीत दे दो और उसके बाद चले जाना। बर्मन दा के पांव फिर ठहर गए और उन्होंने फिल्म मिसाल में बतौर संगीतकार काम किया। फिल्म के गाने बड़े हिट रहे और यहीं से उन्होंने हिंदी फिल्मों में संगीत देना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने देव आनंद और गुरु दत्त की फिल्मों के लिए संगीत दिया।

जब लता दीदी से नाराज हो गए थे एसडी बर्मन, बेटे आरडी बर्मन ने कराई थी दोनों की सुलह

सचिन दा गानों को लेकर थोड़ी भी लापरवाही नहीं बरतते थे। यही वजह है कि एक बार उनकी लता दीदी से कहा-सुनी हो गई। दरअसल, लता दीदी ने फिल्म ‘सितारों से आगे का’ गाना ‘पग ठुमक चलत’ रिकॉर्ड किया था। रिकॉर्डिंग के समय तो बर्मन दा ने गाने को ओके कर दिया, पर कुछ दिन उन्होंने लता दीदी को कॉल करके कहा कि उन्हें गाने की दोबारा रिकॉर्डिंग करनी पड़ेगी। लता दीदी ने इसके लिए मना कर दिया। पहली वजह ये थी कि वो मुंबई से बाहर थीं और दूसरी ये कि जब एक बार संगीतकार गीत को ओके कह देता है तो दोबारा रिकॉर्डिंग नहीं होती। इसके बाद दोनों एक-दूसरे से बेहद नाराज हो गए थे। कुछ सालों बाद दोनों की नाराजगी बर्मन दा के बेटे आरडी बर्मन ने दूर करवाई थी।

संगीत का महारथी होने के बावजूद फेमस थे बर्मन दा के कंजूसी के किस्से

राजघराने से ताल्लुक रखने वाले एसडी बर्मन बहुत ही कंजूस थे। उनकी कंजूसी के किस्से पूरे इंडस्ट्री में मशहूर थे। साथ ही फालतू खर्च करना भी उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था। यही वजह है कि जब भी वो मंदिर दर्शन के लिए जाते थे तो जूते और चप्पल की जोड़ी एक साथ नहीं रखते थे। एक बार उनसे किसी ने उनकी इस आदत के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि आजकल चप्पल की चोरी बढ़ गई है। इसके बाद दोबारा उस आदमी ने पूछा कि आप अलग-अलग चप्पल क्यों रखते हो और यदि चोर ने चप्पल के ढेर में से दूसरी चप्पल भी निकाल ली तो? इसके बाद हंसते हुए बर्मन दा ने कहा कि यदि चोर इतनी मेहनत करता है, तो वह वाकई इसे पाने का हकदार है।

जब 1 रुपए के लिए बर्मन दा साहिर लुध‍ियानवी से भिड़ गए थे

किस्सा ये है कि गुरु दत्त अपनी फिल्‍म ‘प्यासा’ बना रहे थे। इस फिल्म में काम करने के लिए साहिर लुधियानवी, बर्मन दा से 1 रुपए अधिक चाहते थे। साथ ही उन्होंने अपनी इस जिद का ये तर्क दिया था कि एसडी के संगीत की लोकप्रियता में उनका बराबर का हाथ था। मतलब कुल मिला कर दोनों की अनबन की वजह ये थी कि गाने का क्रेडिट किसे मिले। बर्मन दा इस शर्त के लिए तैयार नहीं हुए और नतीजतन इसके बाद दोनों ने कभी भी साथ में काम नहीं किया।

जब बेटे आरडी बर्मन के गाने से निराश हो गए थे एसडी बर्मन, सिर झुका कर निकले थे स्टूडियो से बाहर

ये बात उस दौर की है जब आरडी बर्मन ‘दम मारो दम’ गाना बना रहे थे। देव आनंद बर्मन दा के बेहद करीबी थे, लेकिन उन्होंने अपनी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के संगीत का जिम्मा उनके बेटे आरडी बर्मन को दे दिया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि उनका मानना था कि आरडी बर्मन उनकी फिल्मों के गानों को नयापन दे सकते हैं। गाना रिकॉर्ड हुआ, लेकिन जब गाने की रिकॉर्डिंग बर्मन दा ने सुनी, तो बेहद निराश और नाराज हो गए। उनका मानना था कि उनके बेटे ने संगीत के साथ मजाक किया और उनकी दी हुई शिक्षा का भी अपमान किया है। इसी वजह से वो स्टूडियो से चुपचाप बिना कुछ कहे और सिर झुकाकर बाहर निकल गए।

जब बर्मन दा ने चुरा ली थी बेटे आरडी बर्मन की धुन

आरडी बर्मन भी बचपन से ही संगीतकार बनना चाहते थे। 9 साल की उम्र में उन्होंने ऐसी धुन बनाई थी कि जिसका इस्तेमाल उनके पिता बर्मन दा ने अपनी फिल्म फंटूश के लिए किया था। दरअसल बात कुछ ऐसी है कि जब आरडी बर्मन 9 साल के थे तो क्लास में उनके सबसे कम नंबर आए थे। जब ये बात उनके पिता बर्मन दा को पता चली तो उन्होंने कहा कि ये सब क्या है, तुम्हें पढ़ाई नहीं करनी है क्या। इसके बाद उन्होंने पूछा कि आखिरकार तुम करना क्या चाहते हो। तब आरडी बर्मन ने पिता से कहा कि मैं आपसे भी बड़ा संगीतकार बनना चाहता हूं।

इस पर एसडी बर्मन ने उनसे पूछा कि कोई धुन भी बनाई है तुमने। इस पर आरडी बर्मन ने एक-दो नहीं, बल्कि पूरी 9 धुनें पिता के सामने रख दीं। इस पर एसडी बर्मन ने कोई जवाब नहीं दिया और वो मुंबई लौट आए। कुछ समय बाद कोलकाता के एक थिएटर में फिल्म फंटूश आई जिसके एक गाने में आरडी बर्मन की ही धुन थी जो उन्होंने पिता को बताई थी। उस गाने के बोल थे, आई मेरी टोपी पलट के।

जब ये बात आरडी बर्मन को पता चली तो वो अपने पिता से नाराज हो गए और कहा कि आपने मेरी धुन क्यों चुराई है। एसडी बर्मन हाजिर जवाब थे, उन्होंने फौरन आरडी बर्मन से कहा कि मैं तो यह देख रहा था कि तुम्हारी धुन लोगों को पसंद भी आती है या नहीं।

जब अपने पसंदीदा फुटबॉल टीम के जीतने पर कोमा में बर्मन दा ने आंखें खोल दी थी

गानों के साथ- साथ बर्मन दा को खाने-पीने और फुटबॉल का भी बहुत शौक था। एक बार ईस्ट बंगाल की फुटबॉल टीम मोहन बागान से हार गई। इस बात से बर्मन दा बहुत दुखी हो गए और उन्होंने गुरु दत्त से कहा कि आज वो खुशी वाला गीत नहीं बना सकते हैं। कोई दुख वाला गीत बनवा लो।

एक किस्सा ये भी है कि बर्मन दा अपनी जिंदगी के आखिरी समय में कोमा में चले गए थे और उन्हें ठीक करने की हर कोशिश नाकाम हो चुकी थी, लेकिन उन्होंने एक बात सुनकर अपनी आंखें खोल दी थीं। दरअसल, एक दिन फिर से ईस्ट बंगाल और मोहन बागान के बीच फुटबॉल मैच हो रहा था। इस मैच में ईस्ट बंगाल ने मोहन बागान को 5-0 से हरा दिया। जब ये खबर बर्मन दा को बेटे आरडी बर्मन ने चिल्ला कर दी, तो खबर को सुनते ही उन्होंने अंतिम बार अपनी आंखें खोली थीं। इसके कुछ दिन बाद ही 31 अक्टूबर 1975 को बर्मन दा की मौत हो गई।



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