प्रधानमंत्री जी, कुपोषण की समस्या भजन से नहीं भोजन से दूर होती है


बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कुपोषण की समस्या पर बात करते हुए श्रोताओं से कहा कि क्या वे जानते हैं कि भजन, गीत और संगीत के माध्यम से कुपोषण कम किया जा सकता है.

नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के 92वें संस्करण में ‘मेरा बच्चा’ अभियान के संदर्भ में बात करते समय एक नई बहस को जन्म दे दिया है. कार्यक्रम के दौरान मध्य प्रदेश में सामुदायिक गतिविधि में बाल भोज के द्वारा कुपोषण में कमी की घटना पर बोलते हुए उन्होंने श्रोताओं से पूछा कि ‘क्या उन्हें पता है कि भजन, गीत और संगीत के माध्यम से कुपोषण कम किया जा सकता है?’

इस दौरान प्रधानमंत्री ने बहुत ही चतुराई से सुलभ रूप से उपलब्ध गुणात्मक खाद्य सामग्री की जगह भजन, गीत और संगीत के पहलू को ज्यादा ही महत्व दिया जो तार्किक और सैद्धांतिक रूप से कुपोषण की समस्या को सुलझाने की तकनीकी और वैज्ञानिक रणनीतियों की महत्ता को प्रत्यक्ष रूप से नकार देता है.

सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि बहुत से अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने कई मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी के अवैज्ञानिक और तर्कहीन दावों के लिए अक्सर उनकी आलोचना की है. कोविड महामारी के दौरान ताली, थाली और दिवाली से शुरू होकर प्रधानमंत्री अब संगीत और भजन के प्रति अधिक आस्थावान दिखते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से देश में बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों के महत्व को नकारने के समान है.

हालांकि, हर सांस्कृतिक और पारंपरिक सामुदायिक प्रथा में विश्वास करना हानिकारक नहीं है, लेकिन समस्या के निदान हेतु वैज्ञानिक महत्व और उनकी तकनीकी रणनीतियों को अनदेखा करना कालांतर में केवल स्थिति को खराब कर सकता है.

अपने बहुचर्चित एकालाप (मन की बात) कार्यक्रम में बोलते हुए प्रधानमंत्री जी ने जिस कहानी का उल्लेख किया उससे साफ पता चलता है कि कैसे समुदाय के सदस्यों ने बालभोज के दौरान घर में उपलब्ध अनाज का इस्तेमाल किया, जिससे कुपोषण के बोझ को कम करने में मदद मिली, लेकिन प्रधानमंत्री ने स्वदेशी भोजन संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका के बजाय भजन और संगीत पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की.

भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मुख्यतया तीन प्रकार के कुपोषण पाए जाते है. हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) और व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण ने भारत के बच्चों, किशोरों और महिलाओं में कुपोषण से संबंधित आंकड़े जारी किए हैं. एनएफएचएस-5 के नतीजे बताते हैं कि किस तरह बीते पांच सालों में बच्चों में स्टंटिंग, वेस्टिंग और कम वजन की स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बने हुए है.

पांच वर्षों के आंकड़े बताते है कि कुपोषण में केवल मामूली गिरावट दर्ज की गई है जो अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है. वर्तमान में, देश में 35% से अधिक बच्चे नाटेपन, 19.3% दुबलेपन, और 32.5% कम वजन की समस्या से ग्रसित हैं, जो दुनिया की कई अविकसित अर्थव्यवस्थाओं की दर से भी अधिक है.

विश्व खाद्य और कृषि संगठन और विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित आंकड़ों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद से अगर संयुक्त रूप से कुपोषण के आंकड़ों कमी होने के बजाय वृद्धि हुई है, जहां कुल कुपोषित आबादी का प्रतिशत 14.9 से बढ़कर 15.5% हो गया है.

अनुमानों के अनुसार, भारत में 2019 में दुनिया की एक-चौथाई से अधिक कुपोषित आबादी थी. हालांकि, 2014 से 2016 तक अल्पपोषण की दर में मामूली गिरावट गिरावट आई थी, लेकिन उसके बाद कुपोषण दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो खतरनाक है.

बच्चों में दीर्घकालिक कुपोषण पैदा करने में कई कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सामाजिक, आर्थिक और गरीबी के अलावा मां की पोषण स्थिति, माता-पिता की शिक्षा का स्तर, स्तनपान की अवधि, गर्भधारण के बीच का अंतराल, कम उम्र में विवाह और खराब स्वच्छता प्रमुख कारकों में है. महिलाओं की लगभग 36% आबादी सामान्य से कम वजन की है और भारत में 15 से 19 वर्ष की आयु के बीच 56% महिलाएं और 56% किशोर लड़कियां आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया से पीड़ित हैं.

भारत में कुपोषण का दर बहुत अधिक है और पांच साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों में से लगभग आधी मौतें खराब पोषण से जुड़ी हैं. प्रारंभिक जीवन में कुपोषण का बच्चों के स्वास्थ्य, शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास, सीखने की क्षमता पर लंबे समय तक प्रभाव पड़ता है. 0-5 से वर्ष के बच्चों में बाल कुपोषण का विश्लेषण दर्शाता है कि देश में स्वास्थ्य और पोषण पर बनाई गई नीतियां और कार्यक्रम इस समस्या को कम करने में पूर्णतया सक्षम नहीं हैं.

भारत में एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) ही एकमात्र ऐसा कार्यक्रम है जो पोषण कार्यक्रमों को लागू करने के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार है. इसमें मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और पोषण में सुधार के लिए छह आवश्यक सेवाएं शामिल हैं. आईसीडीएस का प्राथमिक उद्देश्य पूरक पोषण कार्यक्रम के माध्यम से औसत दैनिक सेवन और जो आहार भत्ता तय किया गया है, उसके बीच के अंतर को कम करने के लिए पर्याप्त आहार सुनिश्चित करना है.

कुपोषण से निपटने के कार्यक्रमों के मिश्रित परिणाम सामने आए हैं. आईसीडीएस कार्यक्रम में मातृ एवं शिशु कुपोषण को दूर करने की उत्कृष्ट क्षमता है, लेकिन प्रमाण बताते हैं कि यह परियोजना लंबे समय में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रही है. अंततः अगर हम सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से कुपोषण के कारकों को समझने से पता चलता है कि यह समस्या बहुआयामी है और देश और समाज की सामाजिक व आर्थिक स्थिति इसके लिए मुख्यतया जिम्मेदार है.

कुपोषण की समस्या को हल करने के लिए संदर्भ आधारित हस्तक्षेप और साक्ष्य-आधारित नीतियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों जैसे विविध भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना, स्वच्छता में सुधार और सुरक्षित पेयजल इत्यादि को पूरा करने की आवश्यकता है. हालांकि, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश का शीर्ष नेतृत्व भजन और अवैज्ञानिक उपायों को बढ़ावा देने में व्यस्त हैं.

(पंकज कुमार मिश्र जेएनयू के सेंटर फॉर सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ में शोधार्थी और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)





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