पिघलते ग्लेशियर, पानी की कमी और पलायन- क्लाइमेट चेंज से कैसे उजड़ते जा रहे लद्दाख के गांव


कुल्लम, लेह: लेह जिले की एक निर्जन हो चुकी बस्ती की पूर्व निवासी सोनम चोंडोल का दो-टूक कहना है, ‘वहां पानी ही नहीं है.’ वह कहती हैं, ‘न तो हमारे पशुओं को खिलाने के लिए घास है, और न ही हमारे खेतों की सिंचाई के लिए कोई साधन है. फिर हम वापस क्यों जाएं?’

सोनम चोंडोल ने ऊपरी कुल्लम गांव के छह अन्य परिवारों के साथ करीब 10 साल पहले अपने घर से पलायन करने का फैसला किया. आजीविका के लिए बेहतर मौके की तलाश में वह करीब पांच किलोमीटर दूर उपशी शहर में आकर बस गईं. चोंडोल ने उस सड़क के किनारे एक कंफेक्शनरी शॉप खोली जो पर्यटकों को पुगा हॉट स्प्रिंग्स की ओर ले जाती है, और अब वह अपनी दुकान से होने वाली कमाई से ही परिवार चला रही हैं.

पानी की कमी के कारण लोगों का पलायन करना एक छोटी-ही सही लेकिन लद्दाख के जिला अधिकारियों और गैर-सरकारी संगठनों को ये सचेत करने की पर्याप्त वजह है कि यदि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए तत्काल कदम न उठाए गए तो इस क्षेत्र का भविष्य क्या होगा.

अधिकांश लद्दाख की तरह कुल्लम भी ग्लेशियर से घिरा है, और उस पानी पर निर्भर करता है जो बर्फ पिघलने के कारण पहाड़ों से नीचे गिरता है. लेकिन पिछले कुछ दशकों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण इस पानी का स्रोत घटता जा रहा है.

हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र—जहां लद्दाख स्थित है—को हिमनदों की बर्फ की मात्रा के कारण तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है. 10 प्रमुख नदी प्रणालियों के स्रोत ये ग्लेशियर वैश्विक औसत की तुलना में बहुत तेजी से गर्म हो रहे हैं.

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