पति-पत्नी को साथ रखने के लिए अदालतों को अधिकार देने वाले कानून का केंद्र करता है समर्थन


नई दिल्ली: कानून के प्रावधानों का समर्थन करते हुए, जो एक अदालत को एक पुरुष या महिला को अपने पति या पत्नी के साथ रहने का निर्देश देने की शक्ति प्रदान करता है, केंद्र सरकार ने सोमवार को एक प्रस्तुतीकरण में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के प्रावधानों का उद्देश्य शादी और परिवार संस्था की रक्षा करना है.

केंद्र ने कहा कि रंजिश में रह रहे जोड़े वैवाहिक समस्याओं के समाधान खोजने के लिए इस उपाय का उपयोग करते हैं, जो इतनी गंभीर नहीं हो सकती है, और ‘वैवाहिक जीवन के सामान्य टूट-फूट को दूर करने के लिए’, यह कहते हुए कि यदि मतभेदों को सुलझाया नहीं जा सकता है, तो युगल तलाक लेने का विकल्प चुन सकते हैं.

केंद्र की दलील सोमवार को उन प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में थी जो वैवाहिक अधिकारों की बहाली की अनुमति देते हैं. चुनौती के तहत प्रावधान, जो हिंदू विवाह एक्ट, विशेष विवाह एक्ट और नागरिक प्रक्रिया संहिता का हिस्सा हैं, एक पति या पत्नी को दूसरे पति या पत्नी को उनके साथ रहने के लिए मजबूर करने को लेकर अदालत जाने की अनुमति देता है.

ये प्रावधान अनिवार्य रूप से एक ऐसे वैवाहिक अधिकार को मान्यता देते हैं – एक साथ रहने का अधिकार (सहवास) और साहचर्य. इस संबंध में अदालत के निर्देश की अवहेलना करने पर संपत्ति की कुर्की जैसे बलपूर्वक उपाय किए जा सकते हैं.

इन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका का विरोध करते हुए, केंद्र सरकार ने विवाह को ‘आपसी दायित्वों की संस्था’ कहा और दावा किया कि ‘वैवाहिक अधिकारों की बहाली की मंशा विवाह की संस्था को संरक्षित करना है.’

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