नगा शांति वार्ता: केंद्र सरकार भारतीय संविधान में नगा संविधान शामिल करने को तैयार- रिपोर्ट


केंद्र के साथ शांति वार्ता कर रहे नगा समूहों का अगुवा संगठन एनएससीएन-आईएम लंबे समय से अलग झंडे और अलग संविधान की मांग पर क़ायम है. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सरकार नगा संविधान को भारतीय संविधान में शामिल करने के लिए तैयार है और उनके सांस्कृतिक ध्वज के इस्तेमाल को भी सहमति दे दी गई है.

नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारत सरकार कथित तौर पर भारतीय संविधान के भीतर नगा संविधान ‘येहज़ाबो’ को शामिल करने के लिए तैयार हो गई है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने इस संबंध में जानकारी दी है.

सरकार कथित तौर पर नगाओं के लिए उनके नागरिक और सांस्कृतिक ध्वज के लिए भी सहमत हो गई है, हालांकि इसे किसी भी सरकारी समारोह में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो और उपमुख्यमंत्री वाई. पैटन समेत नगा अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल इस मुद्दे पर सरकार से बात करने के लिए दिल्ली में है. बातचीत इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के पूर्व विशेष निदेशक एके मिश्रा, जो ब्यूरो में रहने के दौरान पूर्वोतर मामलों के विशेषज्ञ थे, के साथ की जाएगी.

मिश्रा को पिछले साल सितंबर में नगा शांति वार्ता के लिए केंद्र सरकार के वार्ताकार के रूप में नियुक्त किया गया था. उन्होंने नगालैंड के तत्कालीन राज्यपाल आरएन रवि का स्थान लिया था.

नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा) (एनएससीएन-आईएम) वह मुख्य विद्रोही समूह है जो सात नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (एनएनपीजी) के साथ-साथ राज्य और सरकार के बीच शांति वार्ता पर रोक लगा रहा है.

एनएससीएन-आईएम की लंबे समय से नगालैंड के लिए एक अलग संविधान और ध्वज मांग रही है, हालांकि जैसा कि द वायर  ने पहले बताया है कि एनएनपीजी इन दो शर्तों के बिना आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं.

पैटन ने द हिंदू को बताया कि केंद्र सरकार यह स्पष्ट कह रही है कि देश में दो संविधान और दो झंडे नहीं रखे जा सकते हैं, लेकिन एनएससीएन-आईएम इस मांग पर अड़ा हुआ है.

गौरतलब है कि उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है. इन संगठनों का दावा है कि नगा कभी भारत का हिस्सा नहीं थे और अपनी संप्रभुता को लेकर उन्होंने कई दशकों तक हिंसक आंदोलन चलाए हैं.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता वर्ष 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुईवाह और तत्कालीन वार्ताकार आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

हालांकि, संगठन के अलग झंडे और संविधान की अपनी मांग पर अड़े होने की वजह से वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है. संगठन का कहना है कि सरकार ने एनएससीएन-आईएम की अलग झंडे और संविधान की मांग को माना था लेकिन आरएन रवि ने इसे खारिज कर दिया था.

इसके अलावा, एनएससीएन-आईएम आस-पास के राज्यों असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नगा-बहुल क्षेत्रों के एकीकरण के माध्यम से एक ‘ग्रेटर नगालिम‘ (नगालिम) के निर्माण पर जोर दे रहा है. पैटन ने कहा कि सरकार ने यह मांग ठुकरा दी है.

बुधवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करने वाले पैटन ने कहा कि केंद्र सरकार दशकों से चले आ रहे नगा राजनीतिक संकट को खत्म करने की इच्छुक है और प्रधानमंत्री ने क्षेत्र के विकास में रुचि दिखाई है.

द हिंदू ने पैटन के हवाले से लिखा है, ‘जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने अपने दस साल के कार्यकाल में एक बार भी नगालैंड का दौरा नहीं किया. नरेंद्र मोदी जी ने पिछले सात वर्षों में दो बार नगालैंड का दौरा किया है और नारा दिया है कि अगर पूर्वोत्तर विकसित होता है तो पूरे देश का विकास होता है.’

पैटन राज्य की 60 सदस्यीय विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का प्रतिनिधित्व करते हैं.

अगले साल मार्च में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों के आलोक में यह ताजा घटनाक्रम काफी मायने रखता है. इस पर पैटन ने अखबार को बताया कि अगर चुनाव से पहले नगाओं और सरकार के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हो जाते हैं तो जब तक कि चुनाव नहीं होता, राज्य में अंतरिम सरकार बनाई जा सकती है.

यह घटनाक्रम केंद्र सरकार द्वारा नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल के निकी सुमी के नेतृत्व वाले अलग गुट एनएससीएन-के, के साथ संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक दिन बाद आया है. हालांकि संघर्ष विराम पिछले साल सितंबर से लागू है, लेकिन इसे बुधवार (7 सितंबर) को 7 सितंबर 2023 तक नवीनीकृत किया गया है.

इससे अलग, सरकार संघर्ष विराम समझौतों में दाखिल होने के बाद एनएससीएन के अलग-अलग गुटों से शांति वार्ता भी कर रही है.

जिन समूहों ने संघर्ष विराम समझौते किए हैं वे एनएससीएन-एनके, एनएससीएन-आर, एनएससीएन के-खांगो और एनएससीएन (के) निकी हैं.





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