तेज म्यूटेशन, भारी बारिश, गौशालाओं में जरूरत से ज्यादा मवेशी—कैसे जंगल के आग की तरह फैली लंपी बीमारी


नई दिल्ली/अहमदाबाद: गाय-भैंसों को प्रभावित करने वाला एक वायरल संक्रमण लंपी स्किन इस साल जुलाई से अब तक कम से कम 67,000 मवेशियों की जान ले चुका है और इसकी वजह से हजारों परिवारों की आजीविका छिन गई है. तमाम गांवों में एकदम मातम छाया हुआ है जहां जगह-जगह सड़कों पर सड़ते मवेशियों के शव, सामूहिक कब्रें और ढंग से सांस तक नहीं ले पा रहे बीमार जानवर नजर आते हैं.

2019 की शुरुआत, जब भारत में पहली बार ‘ट्रांसबाउंड्री’ बीमारी की सूचना मिली, उसके बाद भी यह प्रकोप होता रहा है लेकिन कोई इतना घातक नहीं था.

लंपी स्किन डिजीज वायरस (एलएसडीवी)—जो मंकीपॉक्स का कारण बनने वाले पॉक्सवायरस फैमिली का ही होता है—मनुष्यों को संक्रमित नहीं कर पाता है. यह गुजरात, राजस्थान और पंजाब में कहर बरपा रहा है और हरियाणा, हिमाचल प्रदेश व अन्य राज्यों के तमाम इलाके भी इसकी चपेट में हैं.

भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है, और मवेशियों में एलएसडीवी के प्रकोप ने कृषि अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डाला है. कम दुग्ध उत्पादन और व्यापार प्रतिबंधों के कारण डेयरी किसानों की आजीविका भी बुरी तरह प्रभावित हुई है.

गुजरात के कच्छ के गांधीधाम में मवेशियों के लिए बने एक कैंप में लंबी स्किन बीमारी से मरी गाय देखती दूसरी गाय । प्रवीण जैन । दिप्रिंट

लंपी स्किन से प्रभावित मवेशियों की देखभाल काफी कठिन होती है और उन्हें ठीक होने में भी काफी समय लगता है. क्लीनिकल सिम्पटम में नाक से स्राव, फिर तेज बुखार और दुग्ध उत्पादन में तेज गिरावट शामिल है. इसके बाद पशु की त्वचा पर 10 से 50 मिमी की गांठें नजर आने लगती हैं और पैरों में सूजन आ जाती है. आंखों में पीड़ादायक अल्सरेटिव घाव हो जाते हैं, जो अंधेपन की वजह बन सकते हैं, और आंतरिक अंगों में घाव भी होने की आशंका रहती है.

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