जिसने पार्टी हित को राष्ट्रहित से ऊपर रखा, उसके लिए राष्ट्रध्वज दल के झंडे के नीचे ही होना चाहिए


राष्ट्रध्वज को जब बहुसंख्यकवादी अपराध को जायज़ ठहराने के उपकरण के रूप में काम में लाया जाने लगेगा, वह अपनी प्रतीकात्मकता खो बैठेगा. फिर एक तिरंगे पर दूसरा दोरंगा पड़ा हो, इससे किसे फ़र्क़ पड़ता है?

कल्याण सिंह की श्रद्धांजलि सभा में उनके शव पर भाजपा का झंडा रखते राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और यूपी प्रदेशाध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह. (फोटो साभारः ट्विटर)

छवियों के भीतर छवियां होती हैं. दो दिन से देख रहा हूं कि अनेक लोग उत्तेजित हैं कि राष्ट्रध्वज को भारतीय जनता पार्टी के झंडे से ढंक दिया गया है. इसे राष्ट्रध्वज का अपमान बतलाया जा रहा है. लेकिन जो उत्तेजित हैं क्या वे यह महसूस कर पा रहे हैं कि उनके क्षोभ से प्रायः भारत के लोग प्रभावित नहीं हैं.

शायद ही लोगों को यह दृश्य इतना असामान्य लग रहा हो कि वे आंदोलित हो उठें. ऐसा क्यों हुआ होगा? इसका एक कारण तो यह है कि जो यह सवाल कर रहे हैं, उनमें से किसी ने नहीं पूछा कि इस छवि में राष्ट्रध्वज का जो इस्तेमाल किया गया, वही उपयुक्त था या नहीं या राष्ट्रीय ध्वज का यह उपयोग ही उसका अपमान है या नहीं.

जो भारतीय संविधान के नाम पर ली गई शपथ को भंग करते वक्त ज़रा नहीं झिझका और जिसने बाद में इस वचन-भंग को गर्वपूर्वक अपनी वीरता बतलाया क्या उसके पार्थिव शरीर को राष्ट्रध्वज के स्पर्श की गरिमा का अधिकार है? वह मूल प्रश्न था. लेकिन वही प्रश्न पूछा नहीं जा रहा है.

आखिर किसे याद नहीं है कि कल्याण सिंह ने अदालत को दिए गए वचन को तोड़ दिया था कि 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में लाखों ‘कारसेवकों’ के इकठ्ठा होने के बावजूद बाबरी मस्जिद की सुरक्षा का पूरा इंतजाम वे करेंगे और इसकी गारंटी करेंगे कि उसे कोई नुकसान न पहुंचे.

उन्होंने अपनी संवैधानिक मर्यादा को भंग कर दिया और भारत राष्ट्र के व्यापक हित के ऊपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक फायदे को तरजीह दी और उसके लिए मुख्यमंत्री के अपने संवैधानिक पद का दुरुपयोग किया.उन्होंने बाबरी मस्जिद की सुरक्षा नहीं की और उसे ढाह दिए जाने का पूरा मौक़ा ‘कारसेवकों’ को दिया.

अदालत को उन्होंने यह वचन भी दिया था कि बाबरी मस्जिद की ज़मीन पर कोई निर्माण कार्य नहीं होगा. इसका उल्लंघन भी उन्होंने किया और इसके लिए उन्हें अदालत ने सजा भी दी. वह प्रतीकात्मक सजा, एक दिन की कैद थी. लेकिन वे सज़ायाफ्ता तो हुए ही. और यह कोई स्वाधीनता संघर्ष न था जिसमें जेल गौरव की बात हो. वह वादाखिलाफ़ी यह बात लोग भूल जाते हैं.

यह बात अलग है कि सर्वोच्च न्यायलय ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के मामले में अदालत की अवमानना के मामले को आगे नहीं बढ़ाया. अदालत की उस हिचकिचाहट का नतीजा कई साल बाद देखा जब बाबरी मस्जिद की ज़मीन पर उसके वजूद को कबूल करने के बावजूद वह ज़मीन फिर अदालत के द्वारा ही मस्जिद को तोड़ने का अभियान चलानेवालों को सुपुर्द कर दी गई.

बाबरी मस्जिद के ध्वंस के अपराध में अपनी भूमिका के बारे में कल्याण सिंह ने लाल कृष्ण आडवाणी और दूसरे भाजपा के नेताओं की तरह ही अलग-अलग समय पर अलग-अलग किस्म के बयान दिए.जब उन्हें लगा कि मौक़ा ठीक नहीं है तो इस कृत्य में किसी भी भागीदारी से उन्होंने इनकार किया. लेकिन जब लगा कि अपने लोग ही कोतवाल और मुंसिफ हैं, तो सीना ठोंककर इसका ‘श्रेय’ लेने वे आगे आ गए.

इससे इन नेताओं की चतुराई की तो आप तारीफ़ कर सकते हैं लेकिन क्या इन्हें वीर और ईमानदार भी कह पाएंगे?

बाबरी मस्जिद ध्वंस का अपराध एक मस्जिद के ध्वंस का अपराध तो था ही लेकिन लोगों ने ठीक ही उसे आज़ाद भारत की बुनियाद पर ही आघात की संज्ञा दी. बाबरी मस्जिद का मलबा भारतीय धर्मनिरपेक्षता का मलबा भी था. बाबरी मस्जिद के ध्वंस के अपराध के जिम्मेदारों को अगर सजा दी गई होती तो भारत आज इस हाल में न होता.

यह भारत का दुष्काल है लेकिन भारतीय जनता पार्टी का स्वर्ण काल है. इसमें योगदान के लिए कल्याण सिंह को वह पार्टी सम्मानित करे, यह उसकी दृष्टि से उचित ही होगा. लेकिन भारत राष्ट्र, अगर वह सिर्फ एक दल का नहीं है, ऐसे व्यक्ति के बारे में क्या रुख लेगा जिसने समाज को विभाजित करने के लिए राज्य के संसाधनों का और संवैधानिक शक्ति का उपयोग किया? और राष्ट्रध्वज तो राष्ट्र का है!

जब यह सवाल नहीं किया जाएगा, दूसरा व्यर्थ होगा. राष्ट्रध्वज को जब बहुसंख्यकवादी अपराध को जायज ठहराने के उपकरण के रूप में काम में लाया जाने लगेगा, वह अपनी प्रतीकात्मकता खो बैठेगा. फिर एक तिरंगे पर दूसरा दोरंगा पड़ा हो, इससे किसे फर्क पड़ता है?

वैसे यह तस्वीर ऐसी ही सटीक है. मरहूम का जो रिश्ता इन झंडों से जैसा था, वैसा ही यह तस्वीर बतलाती है. जिस शख्स ने अपनी पार्टी के हित को राष्ट्रहित पर तरजीह दी, उससे जुड़ी तस्वीर में राष्ट्रध्वज को पार्टी के झंडे के नीचे ही दबा होना चाहिए.

इस तस्वीर ने मुझे विचलित नहीं किया. विचलित तब हुआ था जब दादरी में मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या के अभियुक्त के पार्थिव शरीर को राष्ट्रध्वज से लपेटा गया था. जब ईद के रोज़ जामा मस्जिद पर गुंडों की भीड़ राष्ट्रध्वज लेकर चढ़ गई और इबादत करने आए मुसलमानों को झंडा हाथ में देने की जबरदस्ती करने लगी, तब विचलित होने का समय था.

जब राष्ट्रध्वज को कांवड़ यात्री भगवा ध्वज के साथ लेकर चलने लगे, तब सवाल पूछने का वक्त था. जब राष्ट्रध्वज को 207 फ़ीट के खंभे से लहराने का आदेश सारे विश्वविद्यालयों को दिया गया, तब भी प्रश्न का समय था. अब हम उससे बहुत आगे निकल आए हैं.

वैसे जब किसी राष्ट्र में राष्ट्रध्वज, राष्ट्र गान, राष्ट्रीय नारे आदि पर ही सार्वजनिक विचार-विमर्श अधिक होने लगे तो मान लेना चाहिए कि उसके साथ कुछ भारी गड़बड़ हो गई है. परिपक्व और निश्चिंत राष्ट्रों में ये बहस का विषय हों, यह उनके लिए लज्जा की बात होगी. लेकिन जब आप दिल्ली की हर सड़क पर मुख्यमंत्री की यह गर्वोक्ति देखें कि पहली बार उनकी सरकार ने दिल्ली में 115 फीट ऊंचा राष्ट्रध्वज लगाया है तो मालूम हो जाता है कि जनता को ये नेता मूर्ख मान चुके हैं.

जब तिरंगे के ‘अपमान’ की इस छवि पर उत्तेजना उपजाने की कोशिश हो रही थी उसी समय मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक मुसलमान चूड़ी बेचने वाले को सरेआम मारते हुए, उसकी चूड़ियों को तोड़ते हुए गुंडों की तस्वीर भी घूम रही थी. उस पिटते हुए मुसलमान की असहायता और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के नायकों में से एक के शरीर पर डाल दिए गए तिरंगे की असहायता मुझे एक-सी लगी.

इंदौर की तस्वीर के पहले कानपुर के मुसलमान रिक्शेवाले पर हमले की तस्वीर. उसके पहले जंतर मंतर पर मुसलमानों के कत्लेआम के नारों के साथ की तस्वीर! उसके पहले हरियाणा में मुसलमानों के संहार के भाषणों की तस्वीर! उसके भी पहले दिल्ली के उत्तम नगर में मुसलमान फल बेचनेवालों पर हमले की तस्वीर! और उसके बहुत पहले फिर इंदौर में ही आतिशबाजी के सामान बेचनेवाले मुसलमान दुकानदार को धमकी की तस्वीर!

क्या इन तस्वीरों में और तिरंगे के साथ ‘दुर्व्यवहार’ की तस्वीर में कोई रिश्ता है? जब तक इस रिश्ते को हम समझ नहीं लेते, तिरंगे को लेकर हमारा रोना सिर्फ रोना-गाना ही होकर रह जाएगा.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)





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