जनरल रावत का ‘सभ्यता का टकराव’ विवाद दिखाता है, कि सेना को प्रेस में सुनाई नहीं सिर्फ दिखाई देना चाहिए


सीडीएस जनरल बिपिन रावत । एएनआई


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15 सितंबर को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने, दिल्ली में सामरिक समुदाय की एक सभा के सामने एक सवाल रखा. उन्होंने वाकपटुता के साथ उनसे पूछा कि क्या ईरान, टर्की, और अफगानिस्तान के साथ चीन का बढ़ता मेल-मिलाप, ‘सभ्यताओं के टकराव’ को फिर से शुरू करेगा, जिसमें चीनी और इस्लामी सभ्यताएं, पश्चिमी दुनिया के खिलाफ एक जुट हो जाएंगी? सीडीएस द्वारा उठाया गया सवाल एक बौद्धिक प्रवचन का हिस्सा था, और किसी भी मानदंड से एक नीति वक्तव्य नहीं था. लेकिन मीडिया ने उसे इसी तरह पेश किया, और चीन-भारत रिश्तों के एक संवेदनशील दौर में, एक विवाद के बीज बो दिए.

अगले दिन, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुशांबे में, शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन में एक मीटिंग से इतर, अपने चीनी समकक्ष वांग यी के सामने इस संदेह पर सफाई देने की कोशिश की: ‘भारत ने कभी सभ्यताओं के टकराव के सिद्धांत का समर्थन नहीं किया’. लेकिन सीडीएस, जिनका विवादों से पुराना नाता है, फिर से आलोचनाओं के घेरे में आ गए. इस घटना ने सिविल-सैन्य-मीडिया के परस्पर रिश्तों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनकी जांच की आवश्यकता है.


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CDS का बयान और भारत के विदेश संबंध

ऐसा लगता है कि विदेश मंत्री का स्पष्टीकरण, सरकार के सिविल-सैन्य अंगों के बीच मतभेद की ओर इशारा करता है. इस मतभेद की बुनियाद मीडिया ने रखी, जिसने सीडीएस के एक बौद्धिक सवाल को एक नीति वक्तव्य की तरह पेश किया. लगता है कि विदेश मंत्रालय (एमईए) ने उचित मूल्यांकन के बिना, आंखें बंद करके मीडिया के नैरेटिव को मान लिया. उससे भी ख़राब ये, कि उन्हें लगा होगा कि उनके पास उच्च-स्तरीय कूटनीतिक बातचीत से पहले, चीन के खिलाफ नंबर बनाने का एक अवसर है, ख़ासकर ऐसे समय जब रिश्तों में एक तनाव है, जिसे सामान्य करने की ज़रूरत है.

एमईए द्वारा सीडीएस की टिप्पणी के विकृत संदर्भ की काट करना, एक सोचा समझा क़दम था और उसे राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने की दिशा में, एक चतुर कूटनीति की तरह देखा जा सकता है. ये सवाल अभी भी बाक़ी है कि क्या सीडीएस को, जिनके सर पर कई भारी हैट्स हैं, ऐसे सार्वजनिक बयान देने चाहिएं, जो भारत के विदेश संबंधों के साथ टकराते हों?

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