क्या नरेंद्र मोदी का ‘कर्तव्य पथ’ उनके अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ने का प्रतीक है


नागरिकों को कर्तव्यपरायण होने के लिए प्रोत्साहित करना तानाशाही शासन का एक प्रमुख अंग है. इसे पहली बार आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी द्वारा लाया गया था. तब से जिन सरकारों ने भी आम लोगों के अधिकारों की अवहेलना की, उन्होंने अक्सर अपने फ़र्ज़ की बजाय नागरिकों के कर्तव्यों के महत्व को ही दोहराया.

राजधानी दिल्ली स्थित राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया गया है. 8 सितंबर 2022 को इस बदलाव से संबंधित साइन बोर्ड का अनावरण किया गया. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भाजपा के जगहों के नाम बदलने के शौक का नया निशाना राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट को जोड़ने वाला नई दिल्ली का राजपथ बना है, जो अब से ‘कर्तव्य पथ’ के नाम से जाना जाएगा.

किसी ऐसी सड़क का नाम बदलना, जो अच्छे इरादे से न बनी ही, केवल कागज पर होने वाला बदलाव भर नहीं है. यह सड़क नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी ‘सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट’ का एक हिस्सा है और इसे लेकर उनके एजेंडा के बारे में वो ही स्पष्ट तौर पर बता सकेंगे.

इस बीच ज्यादातर भाजपा सदस्यों से भरी अनिर्वाचित नई दिल्ली नगर परिषद ने सात सितंबर को एक विशेष बैठक में नाम बदलने के इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी.

ब्रिटिश शासन के दौरान किंग्सवे के रूप में जानी जाने वाली इस सड़क का नाम आजादी के बाद राजपथ किया गया था. इसे बीच से बांटने वाले जनपथ, जिसे पहले क्वींसवे के नाम से जाना जाता था, के साथ मिलकर यह दो रास्ते नए गणराज्य के उस सामाजिक क़रार को दिखाते थे, जिसकी संप्रभुता इसके नागरिकों के हाथ में थी. इन संप्रभु नागरिकों ने सेंट्रल विस्टा को उन बंदिशों से आज़ाद किया, जो इस पर पिछले निजाम ने लगाई थीं. इसके विशाल लॉन अब उनके थे, जहां वे दिन हो या रात, पिकनिक, खेलने, घूमने और आइसक्रीम खाने के लिए आया करते थे. उन्हें किसी आधिकारिक आदेश या सीमा नहीं बांधती थी, बस सही मौसम और यहां आने का कोई साधन मिलना ही काफी था. हालांकि, अब वो सब खत्म हो रहा है. कर्तव्य पथ में स्वतंत्र नागरिकों के लिए बहुत कम जगह है. 

पिछले महीने अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार द्वारा इस सामाजिक क़रार को निभाने की बढ़ती मांगों को दरकिनार कर दिया और इसके बजाय लोगों द्वारा कर्तव्यों को पूरा करने पर जोर दिया.

नागरिकों को कर्तव्यपरायण होने के लिए प्रोत्साहित करना तानाशाही शासन का एक प्रमुख अंग है और इसे पहली बार आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी द्वारा भारतीय संविधान में शामिल किया गया था. तब से जिन सरकारों को लोगों के अधिकारों की अवहेलना के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है, उन्होंने अक्सर नागरिकों के कर्तव्यों के महत्व को दोहराया है. राजपथ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ करना अधिकारों पर कर्तव्यों को तरजीह देने के आधिकारिक प्रयास का ही प्रतीक है. इस नामकरण के साथ एक तरह का शुद्धिकरण भी आएगा, जिसमें आइसक्रीम विक्रेताओं को वहां उनकी ठेलागाड़ी लाने से रोक दिया जाएगा, लॉन में पिकनिक पर मनाही होगी.

इस नाम बदलने का एक खतरनाक पहलू भी है. एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों को सत्ता के खिलाफ वो दावा माना जाता है, जिसे संविधान के अनुसार, सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि नागरिक को उनसे वंचित नहीं किया जा सकता है.

इस प्रकार ‘राजपथ’ नाम को इस तथ्य के एक प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है कि सरकार और इस सड़क के आसपास स्थित इसके संस्थानों की वैधता केवल उस सीमा तक थी जहां तक ​​वे आम लोगों के अधिकार बरकरार रखते थे. दूसरी ओर, ‘कर्तव्य’ पर जोर देने का नया शिगूफा शासन या गवर्नेंस का भार सामान्य नागरिक पर डालता है. इससे समस्याओं का दोष उन्हीं के माथे आता है और सरकार की जिम्मेदारी से ध्यान हटता है.

नाम बदलने से लेकर शक्लोसूरत बदलने तक

बेशक, पहले नाम बदलने की कवायद का एक राजनीतिक एजेंडा भी था. 2015 में औरंगजेब रोड एपीजे अब्दुल कलाम रोड बन गया. हिंदुत्व कट्टरपंथियों की निगाह अब अकबर रोड और हुमायूं रोड का नाम बदलने पर है. रेसकोर्स रोड, जहां प्रधानमंत्री का आधिकारिक निवास स्थित है, वो लोक कल्याण मार्ग बन गया, हालांकि कई लोगों ने इसकी उपयुक्तता पर सवाल भी उठाया था.

तीन मूर्ति भवन- जहां नेहरू मेमोरियल संग्रहालय और पुस्तकालय स्थित हैं, को देश के विरासत कानूनों की अवहेलना करते हुए एक कुरूप अंतरिक्ष यान का आकार देते हुए ‘प्रधानमंत्री संग्रहालय’ बना दिया गया है. इससे पहले, प्रगति मैदान भी इसी तरह की तोड़फोड़ का गवाह बना था, जब मोदी सरकार ने वहां के ऐतिहासिक हॉल ऑफ नेशंस पवेलियन और अन्य संरचनाओं को तोड़कर एक विशाल इमारत बनाई, जो शिपिंग कंटेनरों के बड़े-से ढेर की तरह दिखती है.

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने ऐतिहासिक शहर इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया है, और उन सभी राज्यों में जहां पार्टी सत्ता में है, विशेष रूप से यूपी, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में, इस तरह के और बदलाव किए जाने हैं. वहां नाम परिवर्तन के लिए एक और मानदंड रखा गया है, जहां भाजपा नेताओं ने 2014 में नरेंद्र मोदी द्वारा दिए ‘1200 साल की गुलामी’ के संदर्भ को मुगलकाल या अन्य मुस्लिम नामों को ‘उपनिवेशवाद के प्रतीक’ के साथ जोड़ दिया है.

‘शासकों के युग का अंत’

अनाम अधिकारियों ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि राजपथ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ नाम रखना ‘सत्तारूढ़ वर्ग को इस बात का संदेश है कि शासकों का युग अब समाप्त हो चुका है.’ उनका यह दावा लोगों के खान-पान, अभिव्यक्ति, कानूनों आदि पर सरकार के बढ़ते नियंत्रण के सामने टिकता नहीं दिखता. आम लोगों की बात तो अलग है, लेकिन नरेंद्र मोदी ने तो भाजपा के संगठन को भी ‘शासक राज‘ में बदल दिया है, वहीं उनकी नाक के नीचे ही ‘सत्ताधारियों’ की संपत्ति में अकूत वृद्धि होती जा रही है.

अगर शहरी डिजाइन के मामले की भी बात करें तो भारत इस मामले में अलग है कि यहां सरकार के मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों को सार्वजनिक खर्च पर राष्ट्रीय राजधानी के केंद्र में बड़े-बड़े बंगले दिए जाते हैं. दरअसल, रायसीना हिल पर प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास की योजना बनाकर मोदी ने वास्तव में ‘शासक’ की अपनी ‘प्रजा’ पर ताकत के उसी विचार को मजबूत किया है, जैसा औपनिवेशिक राज के समय इसी शहर में हुआ था.

2018 में आई अपनी किताब नेगोशिएटिंग कल्चर्स: डेल्हीस आर्किटेक्चर एंड प्लानिंग फ्रॉम 1912 टू 1962 में पिलार मरिया गरिएरी ने दर्ज किया है कि कैसे दिल्ली की सत्ता का केंद्र रायसीना हिल है:

आवास की व्यवस्था में सत्ता के स्वीकृत और परंपरागत नियमों का पालन किया गया: अधिक प्रतिष्ठित और ऊंचे ओहदे वाले यूरोपीय लोग रायसीना हिल से सबसे नजदीक थे, और जैसे-जैसे रहवासियों की सामाजिक स्थिति बदलती, वैसे ही उनकी (रायसीना हिल) से निकटता भी. ऐसे भारतीय, जो सरकारी व्यवस्था के साथ काम नहीं करते थे, वे रायसीना हिल, और यहां तक कि कई बार नई दिल्ली से भी दूर बसी किन्हीं बस्तियों में रहते थे.

रहने की जगह को लेकर यह विशेषाधिकार ‘शासक’ को ‘प्रजा’ से अलग करता है और राजधानी की असमानता को दिखाता है, न कि सड़कों के नाम. नीचे दी गई तस्वीर में इस शहर के औपनिवेशिक योजनाकारों द्वारा नई दिल्ली में बंगलों के वितरण की 1920 की योजना नजर आ रही है. आज भले ही सड़कों के नाम और रहने वालों की चमड़ी का रंग बदल चुका है, बंगले और उनमें रहने वालों का वर्ग वैसे ही बना हुआ है.

1920 में तैयार किया गया नई दिल्ली का प्लान. (साभार: National Archives of India. Via Pilar Maria Guerrieri)

मोदी द्वारा उपनिवेशवाद के इन बदसूरत प्रतीकों से दूर हटने, या उनके मंत्रियों को (अन्य लोकतांत्रिक देशों की तरह) अपना आवास ढूंढने की कहने और इन इमारतों का ‘प्रजा’ द्वारा बेहतर इस्तेमाल करने की कहने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. जनता के लिए मोदी के पास सिर्फ ‘कर्तव्य’ हैं. बाकी शहर सत्ता और उसके पदाधिकारियों के लिए है, जो यह तय करेंगे कि कब, कहां और कितनी संख्या में नागरिक- जिनका कर्तव्य सत्ता के कहे का पालन करना है- जमा हो सकते हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)





Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published.