आर्यन खान, मुनव्वर फारूकी हों या पिंजरा तोड़ के कार्यकर्ता- जमानत का मतलब तत्काल रिहाई क्यों नहीं होता


एनसीबी ऑफिस से आर्थर रोड जेल ले जाये जाते आर्यन खान की फाइल फोटो.


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नई दिल्ली: इस सप्ताह की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने जेल प्रशासन तक जमानत के आदेशों की सूचना पहुंचाने में होने वाली देरी को एक ‘बहुत गंभीर खामी’ करार दिया क्योंकि यह प्रत्येक विचाराधीन कैदी की ‘मानवीय स्वतंत्रता’ से जुड़ा है.

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की इस टिप्पणी और आर्यन खान की देरी से हुई रिहाई ने एक बार फिर से पुराने पड़ चुके जेल नियमों की तरफ सबका ध्यान खींचा है, जो स्वतंत्रता के मुलभूत संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करते हुए विचाराधीन कैदियों को बिना किसी औचित्य के कैद में रहने को मजबूर कर सकते हैं.

पिछले 2 अक्टूबर को गिरफ्तार किये गए आर्यन खान 30 अक्टूबर को ही मुंबई की आर्थर जेल से बाहर निकल पाए. हालांकि बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एन.डब्ल्यू. सांब्रे ने 28 अक्टूबर को उनकी और दो अन्य लोगों की जमानत अर्जी स्वीकार कर ली थी, लेकिन रिहाई की शर्तों को निर्धारित करते हुए एक विस्तृत आदेश 29 अक्टूबर को जारी किया गया था.

उस दिन जब तक जमानत की सुरक्षा राशि सहित खान की जमानत की बाकी सभी औपचारिकताएं पूरी हुईं और रिहाई के लिए वारंट (आदेश) जारी किया गया, तब तक शाम के 5.30 बज चुके थे. इसके बाद आर्थर रोड जेल ने आर्यन को इस आधार पर रिहा नहीं किया कि उसके दस्तावेज शाम 5.30 बजे, जो इस तरह के कागजात प्राप्त करने के लिए निर्धारित समय है, के बाद वहां पहुंचे.

लेकिन आर्यन खान का मामला इसका अकेला उदहारण नहीं है.

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