‘आक्रांता और संरक्षक’- उद्धव की राजनीतिक प्राथमिकताओं के बारे में क्या कहता है उनका भाषण


मुंबई: मराठी वोटों को संगठित करना, गैर-मराठियों और मुसलमानों से अपील करना, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को आक्रांता और शिवसेना को संरक्षक के रूप में दिखाना और सेना की पुरानी आक्रामकता की एक उदार खुराक देकर पार्टी काडर में जांन फूंकना.

ये कुछ अलग-अलग बिंदु थे जिन्हें शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने, महानगर में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के महत्वपूर्ण चुनावों की तैयारी में अपनी पार्टी के मुंबई ‘गट प्रमुखों’ (समूह प्रमुखों) के सामने, अपने पहले संबोधन में छूने की कोशिश की.

शिवसेना के दो फाड़ हो जाने के बाद, जिसमें एकनाथ शिंदे ने बागियों के एक गुट का नेतृत्व करते हुए बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर महाराष्ट्र में एक नई सरकार बना ली थी, ठाकरे का अपने पार्टी काडर के सम्मुख पहला सार्वजनिक संबोधन था.

कथित रूप से अपने पिता बाल ठाकरे की विचारधारा को छोड़ देने की वजह से अकसर शिंदे गुट की आलोचना का निशाना बनने वाले उद्धव ने सुनिश्चित किया कि उनके भाषण में इसके पर्याप्त उल्लेख हों, कि उनकी पार्टी किस तरह शिवसेना संस्थापक से मिली सीख का पालन कर रही है.

बाल ठाकरे के अंदाज़ तक को अपनाते हुए उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को अपमानजनक उप-नाम दे दिए- शिंदे के लिए ‘मिंधे गट’, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ब्रांड की राजनीति के लिए ‘शाह-नीति’. मराठी शब्द ‘मिंधा’ का मतलब ऐसा व्यक्ति होता है जो अहसानों से दबा हो, जिसमें परोक्ष आरोप था कि शिंदे गुट बीजेपी के नियंत्रण में है.

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